अयोध्या राम जन्मभूमि: 1987 में ही आ जाता फैसला अगर सिंघल की यह बात मान ली जाती
अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट सुबह 10.30 बजे ऐतिहासिक फैसला सुना दिया गया। कोर्ट ने विवादित स्थल पर राम लला का मालिकाना हक माना और मुस्लिम पक्ष को पांच एकड़ वैकल्पिक भूमि किसी दूसरी जगह पर दिए जाने का फैसला सुनाया। इसके बाद मुस्लिम पक्ष के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया। हिंदू महासभा के वकील विष्णु शंकर जैन ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अयोध्या में मुस्लिमों को भव्य मस्जिद बनाने के लिए 5 एकड़ जमीन दी जाए। लेकिन, आजादी के बाद से ही अयोध्या मसले पर कोर्ट में किसी न किसी तरह का केस चलता आ रहा है। लेकिन मामले ने तेजी तब पकड़ी जब 6 दिसंबर 1992 को विवादित स्थल पर विध्वंस हुआ। उसके बाद से इस मामले से जुड़े पक्षकार अपने-अपने दावे करते रहे। लेकिन बहुत कम ही लोगों को पता है कि अगर 1987 में विश्व हिंदू परिषद के महामंत्री अशोक सिंघल को राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के प्रमुख बालासाहेब देवरस से डांट न पड़ती तो उसी समय अपनी जगह से बाबरी मस्जिद को शिफ्ट कर दिया जाता।
इस बात का जिक्र अयोध्या के वरिष्ठ पत्रकार शीतला सिंह की किताब ‘अयोध्या - रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का सच’ किया है। शीतला सिंह अयोध्या विवाद सुलझाने वाली अयोध्या विकास ट्रस्ट के संयोजक भी रहे हैं। साथ ही फैजाबाद (अब अयोध्या) जिले से निकलने वाले अखबार जनमोर्चा के संपादक भी हैं। शीतला सिंह की किताब में इस बात का जिक्र किया गया है कि कैसे संघ प्रमुख देवरस विहिप महामंत्री अशोक सिंघल से बाबरी मस्जिद मसले पर नाराज हो गए थे। देवरस ने सिंघल को कड़ी डांट पड़ी थी।
शीतला सिंह की किताब में लिखा है कि अशोक सिंघल को डांट इसलिए पड़ी थी कि क्योंकि 27 दिसंबर 1987 को पांचजन्य और ऑर्गेनाइजर अखबार खबर छपी थी कि रामभक्तों की विजय हो गई। कांग्रेस सरकार मंदिर बनाने के लिए विवश हो गई है। इसके लिए ट्रस्ट बनाया गया है. इसे राम मंदिर आंदोलन की सफलता बताया जा रहा है। उस समय एक तरीका यह निकाला गया था कि विदेशी तकनीक के जरिए बाबरी मस्जिद को बिना कोई नुकसान पहुंचाए, उसे उसकी जगह से हटाया जाना था। साथ ही राम चबूतरे से राम मंदिर का निर्माण शुरू करना था. इस खबर के साथ ही, पांचजन्य के मुख्यपृष्ठ पर विहिप महामंत्री अशोक सिंघल की फोटो छपी थी।
शीतला सिंह ने अपनी किताब में केएम शुगर मिल्स के मालिक और प्रबंध संचालक लक्ष्मीकांत झुनझुनवाला के हवाले से इस घटना की पूरी कहानी लिखी है। झुनझुनवाला उस वक्त विहिप के वरिष्ठ नेता विष्णुहरि डालमिया के लिए कुछ कागजात लेने शीतला सिंह के पास आए थे।
लक्ष्मीकांत झुनझुनवाला ने बताया कि उस दिन दिल्ली में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के झंडेवालान स्थित मुख्यालय केशव सदन में एक बैठक हुई थी। इसमें संघ प्रमुख बालासाहेब देवरस भी मौजूद थे। उन्होंने सबसे पहले अशोक सिंघल को बुलाया और पूछा कि तुम इतने पुराने स्वंयसेवक हो, तुमने इस योजना का समर्थन कैसे कर दिया?
सिंघल ने कहा कि हमारा आंदोलन तो राममंदिर के लिए ही था. यदि वह स्वीकार होता है तो स्वागत करना ही चाहिए। इस बात पर देवरस उन पर बिफर पड़े और कहा कि तुम्हारी अक्ल घास चरने चली गई है। इस देश में राम के 800 मंदिर हैं, एक और बन जाए तो 801वां होगा। लेकिन यह आंदोलन जनता के बीच लोकप्रिय हो रहा था। उसका समर्थन बढ़ रहा था, जिसके बल पर हम राजनीतिक रूप से दिल्ली में सरकार बनाने की स्थिति तक पहुंचते. तुमने इसका स्वागत करके वास्तव में आंदोलन की पीठ पर छुरा भोंका है। यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं होगा।
जब अशोक सिंघल ने बताया कि इसमें तो मंदिर आंदोलन के महंत अवेद्धनाथ, जस्टिस देवकीनंदर अग्रवाल सहित स्थानीय और बाहर के कई नेता शामिल हैं, तो देवरस ने सिंघल से कहा कि इससे बाहर निकलो, क्योंकि यह हमारे उद्देश्यों की पूर्ति में बाधक होगा।


