सावन की शिवरात्रि
सावन की शिवरात्रि का क्या महत्व और मान्यता है | सावन का पूरा महीना महादेव की पूजा अर्चना में गुज़रता है। शिवपुराण के अनुसार, भगवान शिव ने माता पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर सावन के महीने में ही उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया था। साथ-साथ उन्होंने यह भी कहा था कि जो भी भक्त सावन में मेरी पूजा करेगा उनकी सभी मनोकामना पूरी होगी। साल में 12 या 13 शिवरात्रियां होती हैं। हर महीने एक शिवरात्रि पड़ती है, जो कि पूर्णिमा से एक दिन पहले त्रयोदशी को होती है। लेकिन इन सभी शिवरात्रियों में दो सबसे महत्वपूर्ण हैं - पहली है फाल्गुन या फागुन महीने में पड़ने वाली महाशिवरात्रि और दूसरी है सावन शिवरात्रि। हिन्दू धर्म को मानने वाले लोगों की शिवरात्रि में गहरी आस्था है। यह त्योहार भोले नाथ शिव शंकर को समर्पित है। मान्यता है कि सावन की शिवरात्रि में रात के समय भगवान शिव की पूजा करने से भक्तों के सभी दुख दूर होते हैं और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जो भी शिवरात्रि पर सच्चे मन से भोले भंडारी की आराधना करता है उसे अपने जीवन में सफलता, धन-संपदा और खुशहाली मिलती है। यही नहीं बुरी बलाएं भी उससे कोसों दूर रहती हैं।
महादेव शंकर को सभी देवताओं में सबसे सरल माना जाता है और उन्हें मनाने में ज्यादा जतन नहीं करने पड़ते। भगवान सिर्फ सच्ची भक्ति से ही प्रसन्न हो जाते हैं। यही वजह है कि भक्त उन्हें प्यार से भोले नाथ बुलाते हैं। सावन के महीने में कांवड़ यात्रा का विशेष महत्व है जिसका सीधा संबंध सावन की शिवरात्रि से है। सावन की शिवरात्रि मनाने के संबंध में कई कथाएं प्रचलित हैं। हालांकि सबसे प्रचलित मान्यता के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान निकले विष को भगवान शिव घटाघट पी गए। इसके परिणामस्वरूम वह नकारात्मक ऊर्जा से पीड़ित हो गए। त्रेता युग में रावण ने शिव का ध्यान किया और वह कांवड़ का इस्तेमाल कर गंगा के पवित्र जल को लेकर आया। गंगाजल को उसने भगवान शिव पर अर्पित किया। इस तरह उनकी नकारात्मक ऊर्जा दूर हो गई।
कांवड़ यात्रा हर साल सावन के महीने में शुरू होकर सावन की शिवरात्रि के साथ खत्म होती है। कांवड़ एक खोखले बांस को कहा जाता है और इस यात्रा पर जाने वाले शिव भक्त कांवड़ए कहलाते हैं। कांवड़ यात्रा के दौरान शिव भक्त हरिद्वार, गौमुख, गंगोत्री, बैद्यनाथ, नीलकंठ, देवघर समेत अन्य स्थानों से गंगाजल भरकर अपने स्थानीय शिव मंदिरों के शिवलिंग पर चढ़ाते हैं। गंगाजल को कांवड़ यानी कि बांस के डंडे पर लाया जाता है। खास बात यह है कि इस जल या कांवड़ को पूरी यात्रा के दौरान जमीन से स्पर्श नहीं कराया जाता है। शिवरात्रि के दिन पूजा का शुभ समय मध्य रात्रि माना गया है। इसलिए भक्तों को शिव की पूजा मध्य रात्रि में करनी चाहिए। इस शुभ मुहर्त को ही निश्चित काल कहा जाता है.-शत्रु































