क्या था मुस्लिम पक्ष जिसे सुप्रीम कोर्ट ने ख़ारिज कर दिया
अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट सुबह 10.30 बजे ऐतिहासिक फैसला सुना दिया गया। कोर्ट ने विवादित स्थल पर राम लला का मालिकाना हक माना और मुस्लिम पक्ष को पांच एकड़ वैकल्पिक भूमि किसी दूसरी जगह पर दिए जाने का फैसला सुनाया। इसके बाद मुस्लिम पक्ष के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया। हिंदू महासभा के वकील विष्णु शंकर जैन ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अयोध्या में मुस्लिमों को भव्य मस्जिद बनाने के लिए 5 एकड़ जमीन दी जाए। भाजपा नेता नितिन गडकरी ने कहा कि लोकतांत्रिक फैसला दिया है, जिसका हर किसी को स्वागत करना चाहिए।
अयोध्या मामले के मुस्लिम पक्षकार इकबाल अंसारी का सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बयान सामने आया है। इकबाल अंसारी ने कहा कि 'मैं खुश हूं कि आखिर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया है। मैं कोर्ट के निर्णय का सम्मान करता हूं।'
चीफ जस्टिस ने अपने फैसले में कहा कि मुस्लिम पक्ष यह साबित नहीं कर सकता कि विवादित स्थल पर 1528 से 1856 तक नमाज पढ़ी जाती थी।
1934 में यहां सम्प्र्दायिक दंगा हुआ था, जिसके बाद अंग्रेजों ने हिंदुओं और मुस्लिमों को दूर रखने के लिए विवादित स्थल को रैलिंग से अलग-अलग कर दिया। इसके बाद हिंदू अंदर पूजा करने के बजाए बाहर चबूतरे पर पूजा करने लगे। इसी आधार पर मुस्लिम पक्ष ने मस्जिद होने का दावा किया था।
विवादित स्थल पर पहले राम मंदिर था, यह साबित होने में एएसआई की रिपोर्ट बहुत अहम रही। आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) की रिपोर्ट में कहा गया था कि विवादित स्थल पर पहले मंदिर था। मंदिर के अवशेषों के ऊपर ही मस्जिद बनाई गई थी। इसके साथ ही ट्रेवलर्स के कमेंट को भी अहम माना गया। इन ट्रेवलर्स ने लिखा था कि विवादित स्थल पर मंदिर था।
आमतौर पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला अंतिम माना जाता है क्योंकि इसके बाद किसी अन्य कोर्ट में सुनवाई नहीं होती है। फिर भी कोर्ट के फैसले से असंतुष्ट पक्ष के पास दो कानूनी विकल्प हैं जिसका वह इस्तेमाल कर सकता है। पक्षकार सुप्रीम कोर्ट में ही पुनर्विचार याचिका दाखिल कर फैसले पर दोबारा विचार करने की मांग कर सकते हैं। पुनर्विचार याचिका बेंच द्वारा अगर खारिज कर दी जाती है तो असंतुष्ट पक्ष क्यूरेटिव याचिका दाखिल कर सकते हैं। हालांकि पुनर्विचार याचिका और क्यूरेटिव याचिका पर सुनवाई के नियम तय है।
तय नियमों के मुताबिक किसी भी फैसले के खिलाफ 30 दिन के भीतर पुनर्विचार याचिका लगाई जा सकती है। हालांकि याचिका पर वहीं बेंच विचार करती है जिसने यह फैसला सुनाया है। इसके साथ ही पुनर्विचार याचिका में यह साबित करना होता है कि फैसले में साफ तौर पर त्रुटि रही है। आमतौर पर रिव्यू पिटीशन खुली अदालत में सुनवाई नहीं की जाती है। बेंच ऐसी याचिकाओं पर जज चेंबर में सर्कुलेशन के जरिये सुनवाई करती है। वहां वकीलों की दलीलें नहीं होती हैं सिर्फ केस से जुड़ी फाइलें और रिकॉर्ड होता है जिस पर बेंच द्वारा दोबारा विचार किया जाता है।
बेंच द्वारा पुनर्विचार याचिका खारिज किए जाने के बाद 30 दिन के अंदर क्यूरेटिव याचिका दायर की जा सकती है। क्यूरेटव पिटीशन के नियम सख्त हैं। सामान्य तौर पर इस पर भी सुनवाई जज द्वारा सर्कुलेशन के जरिये चेंबर में ही करते हैं। क्यूरेटिव याचिका पर सुनवाई करने वाली बेंच में 3 सबसे सीनियर जज शामिल होते हैं और बाकी फैसला देने वाले जज होते हैं।

