संसद भंग करने के राष्ट्रपति के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने बताया अवैध
कोलंबो : श्री लंका के सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरीसेना द्वारा देश की संसद को भंग करने के फैसले को अवैध ठहराया है। बता दें कि 26 अक्टूबर को सिरीसेना ने रानिल व्रिकमसिंघे को हटाकर उनकी जगह महिंदा राजपक्षे को देश का प्रधानमंत्री बना दिया था। इसके बाद सिरीसेना ने संसद को भंग कर दिया था और 5 जनवरी को चुनाव कराने की घोषणा की थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, सामान्य स्थितियों में राष्ट्रपति संसद को उसके साढ़े चार साल के कार्यकाल से पहले भंग नहीं कर सकते। इसलिए राष्ट्रपति का संसद को भंग करने का फैसला असंवैधानिक है। सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सिरिसेन के नौ नवंबर के उस निर्णय के खिलाफ दिया है जिसमें संसद को भंग करके पांच जनवरी को चुनाव कराने की घोषणा की गई थी।
कार्यकाल खत्म होने से 20 महीने पहले संसद भंग करने के राष्ट्रपति के फैसले के विरोध में सुप्रीम कोर्ट में 13 याचिकाएं दायर की गई थीं। इससे पहले 13 नवंबर को शीर्ष अदालत ने अंतरिम आदेश में पांच जनवरी को चुनाव कराने की अधिसूचना को अवैध करार दे दिया था, जिससे चुनाव प्रक्रिया रुक गई थी। गुरुवार को फैसला सुनाए जाने के समय सुप्रीम कोर्ट के चारों ओर कड़े सुरक्षा बंदोबस्त किए गए थे। स्पेशल कमांडो तैनात किए गए थे।
सिरीसेना द्वारा संसद भंग किए जाने और चुनाव की घोषणा के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने 13 नवंबर को अपने अंतरिम आदेश के तहत रोक लगा दी थी। इस बीच अपदस्थ प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने बुधवार को संसद में स्पष्ट बहुमत साबित कर दिया। बुधवार को संसद में 225 में से 117 सांसदों ने उनके नेतृत्व को लेकर लाए गए विश्वास प्रस्ताव को पारित करने के पक्ष में मतदान किया।
बता दें कि महिंदा राजपक्षे संसद में अपना बहुमत साबित नहीं कर पाए थे। श्री लंका की संसद ने एक प्रस्ताव पारित कर प्रधानमंत्री कार्यालय के राजकोष से खर्च करने के अधिकार पर भी रोक लगा दी थी। यह कदम राजपक्षे के लिए एक बड़ा झटका था।
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