मुहर्रम: दुनिया के दूसरे सबसे बड़े धर्म का साल का पहला महीना
सुन्नी और शिया मुसलमान, भारत और दुनिया भर में मुहर्रम के10वें दिन को मनाते हैं। कई शिया मुसलमान मुहर्रम को शोक के महीने के रूप में मनाते हैं। मोहर्रम की 10 वीं तारीख उस तारीख को अंकित होती है जब कर्बला में नरसंहार हुआ था और जब 680 ईस्वी में इमाम हुसैन की मृत्यु हो गई थी। इमाम हुसैन पैगंबर मोहम्मद के पोते थे। मुसलमानों का मानना है कि ईश्वर ने आदम और हव्वा को मोहर्रम की 10 वीं तारीख को बनाया था।
मुहर्रम इस्लामी वर्ष यानी हिजरी सन् का पहला महीना है। हिजरी सन् का आगाज इसी महीने से होता है। इस माह को इस्लाम के चार पवित्र महीनों में शुमार किया जाता है। साथ ही इस मास में रोजा रखने की खास अहमियत बयान की है। मुख्तलिफ हदीसों, यानी हजरत मुहम्मद (सल्ल.) के कौल (कथन) व अमल (कर्म) से मुहर्रम की पवित्रता व इसकी अहमियत का पता चलता है।ऐसे ही हजरत ने एक बार मुहर्रम का जिक्र करते हुए इसे अल्लाह का महीना कहा। इसे जिन चार पवित्र महीनों में रखा गया है, उनमें से दो महीने मुहर्रम से पहले आते हैं। यह दो मास हैं जीकादा व जिलहिज्ज।एक हदीस के अनुसार अल्लाह के रसूल हजरत ने कहा कि रमजान के अलावा सबसे उत्तम रोजे वे हैं, जो अल्लाह के महीने यानी मुहर्रम में रखे जाते हैं। हजरत मुहम्मद के साथी इब्ने अब्बास के मुताबिक हजरत ने कहा कि जिसने मुहर्रम की 9 तारीख का रोजा रखा, उसके दो साल के गुनाह माफ हो जाते हैं तथा मुहर्रम के एक रोजे का सवाब (फल) 30 रोजों के बराबर मिलता है। गोया यह कि मुहर्रम के महीने में खूब रोजे रखे जाने चाहिए। यह रोजे अनिवार्य यानी जरूरी नहीं हैं, लेकिन मुहर्रम के रोजों का बहुत सवाब है।
इस दिन अल्लाह के नबी हजरत नूह (अ.) की किश्ती को किनारा मिला था। इसके साथ ही आशूरे के दिन यानी 10 मुहर्रम को एक ऐसी घटना हुई थी, जिसका विश्व इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है। इराक स्थित कर्बला में हुई यह घटना दरअसल सत्य के लिए जान न्योछावर कर देने की जिंदा मिसाल है। इस घटना में हजरत के नवासे (नाती) हजरत हुसैन को शहीद कर दिया गया था। कर्बला की घटना अपने आप में बड़ी विभत्स और निंदनीय है। बुजुर्ग कहते हैं कि इसे याद करते हुए भी हमें हजरत का तरीका अपनाना चाहिए। जबकि आज आमजन को दीन की जानकारी न के बराबर है।

