ये कैसी-कैसी ज़िन्दगी...?
जिसे देखो, जी रहा है आजकल 'औपचारिक ज़िन्दगी',
'व्यक्तिगत' खुशियों का यहाँ कोई मोल ही नहीं है,
बस रह गयी है नाम की 'सांसारिक ज़िन्दगी'।
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जब स्वार्थ पड़े, तो गले लगा लो;
जब मतबल ख़त्म, तो पीठ दिखा दो;
आजकल चल रही है ऐसी ही 'व्यवहारिक ज़िन्दगी'।
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संयुक्त घर-परिवार टूट कर, बिखरते जा रहे हैं,
बच्चे बुजुर्गों के सानिध्य को, तरसते जा रहे हैं;
खोती जा रही है अपनों से सजी हुई 'पारिवारिक ज़िन्दगी'।
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शतरंज की बिसात की तरह लोग बिखरे हैं यहाँ,
क्योंकि धन-दौलत की चाहत में उन्होंने दे दी है,
किसी और के हाथों में अपनी 'आधिकारिक ज़िन्दगी'।
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अब लोग रिश्तें जोड़ते हैं, नफा-नुकसान देखकर;
सच्चा प्रेम भी कहीं-कहीं ही, मुश्किल से दिखता है यहाँ,
वरना रह गयी है, बस सौदों से भरी 'व्यापारिक ज़िन्दगी'।
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महलों के सुख में भी तब व्यक्ति का चैन खोने लगता है,
प्रतिपल घुटन सा उसे महसूस होने लगता है,
जब कोई नहीं जी पाता है, अपने 'मनमाफिक जिंदगी'।
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सारे रिश्ते-नाते अब मोबाइल पर चल रहे हैं,
रिश्तें निभाने वाले, हर दिन, हर पल अपने रंग बदल रहे हैं;
सोशल मीडिया पर चलती है, अब सबकी 'सामाजिक ज़िन्दगी'।
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नहीं पड़ना मुझे दिखावे में, नहीं आना किसी के बहकावे में;
नहीं चाहिए मुझे ये धन-दौलत, मुझे रहना है अपनों के साये में;
मुझे जीने दो मेरी यही 'अनौपचारिक ज़िन्दगी'।
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मेरी चाहत है कि लोगों के ज़हन में अच्छी याद बनकर रहूँ,
हर रिश्तें में दिल से वफा ही करुँ,
चाहे मिले लम्बी या 'अल्पकालिक ज़िन्दगी'।
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-------(भावना मौर्य)
















