कश्मीरी पंडित नर संहार को आज भी कोई याद नही करता, ऐसा क्यो ?
19 जनवरी 1990 , लश्कर के आतंकवादियों ने पड़ोसी की सूचना पर जो कि कश्मीरी पंडित के दोस्त और पड़ोसी थे, 40 लोगो को गोली मार दी, गोली सभी को सिर या चेहरे पर मारी ,जिसमे 11 पुरुष ,17 महिलाएं और बाकी बच्चे थे, एक बच्चा उसकी माँ के द्वारा हाथ रखने से मरा, मां नही चाहती कि उसका शोर आतंकवादियों को पता चले इसलिये उसकां मुँह बन्द किया था। तब एक भी स्वयं घोषित बुद्धजीवी न तो अवार्ड लौटाने आया न ही उसे डर लगा, न ही असहष्णुता हुई न ही शाहिनीबाग में आंदोलन,न ही जे एन यू में आज़ादी मांगी गई,न ही जामिया में शेरनी सामने आई।
जब कश्मीरी पंडित को कश्मीर से भगाया जा रहा था ,तब वँहा भी पहले ऐसे ही महिलाओं ने आंदोलन किया था जैसे आज शाहीनीबाग में हो रहा है। किसी समय कश्मीर में शत प्रतिशत हिन्दू रहते थे मगर आज एक प्रतिशत भी नही है। 1990 का समय था तब कश्मीर में दूरदर्शन दिखाने की मनाही थी तब केवल पाकिस्तान टेलीविजन ही दिखाया जा सकता था। और दूरदर्शन देखने पर गोली मार दी जाती थी हैरानी की बात ये है की कश्मीर में भारतीय सेना होने के बाद भी पंडितों के पलायन हुआ, और सरकार स्थानीय और केंद्र की सोती रही क्योकि वो बहने वाला खून हिन्दू का था, उस समय मुफ़्ती ग्रह मंत्री थे।
कश्मीरी पंडित नर संहार को आज भी कोई याद नही करता, ऐसा क्यो, न ही स्वयं घोषित बुद्धजीवी गंगा जमुना की तहजीब की बात करते न ही भारत अनेकों में एक कि बात करते, दुनिया मे सिकन्दर से बड़ा कोई राजा था वो था कश्मीर का ललितादत्य। भारत की जनसंख्या 2050 तकअनुमानित 160 करोड़ से ऊपर चली जायेगी इसमे घुसपैठिये अनुमानित 40 करोड़ होंगे , न खेती के लिये जमीन होगी न भोजन, इसमे देश मे सिर्फ एक वर्ग के लिये ही हल्ला क्यो होता है, 84 में सिख मारे गये क्या उन्होंने आगजनी की, जबकि उनसे बड़ा योद्धा आज के दौर मे कोई नही, क्या कभी ईसाई ने कभी की, क्या भोपाल गैस कांड में 13000 हज़ार लोग मारे गये , क्या तब हुई नही फिर एक वर्ग के लिए ही इतनी सुविधा क्यो , और उस वर्ग को पाकिस्तान से क्या मतलब, क्या देश से बड़ी राजनीति है।


